बड़गूजर राजवंश का इतिहास : History of Badgujar Rajvansh

Gyan Darpan
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कछावा राजवंश के लेख में हमने बताया था कि दुल्हेराय जी कछावा ने मध्यप्रदेश से आकर दौसा के बड़गूजरों को हराकर राजस्थान में कछावा राज्य की नींव डाली थी अत : हमें यह भी जानना चाहिए कि बड़गूजर राजवंश कौन है, उनकी उतपत्ति कहाँ से हुई और उनका इतिहास क्या है ? 

राजपूत शाखाओं का इतिहास पुस्तक में देवी सिंह मंडावा लिखते हैं कि बड़गूजर सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं। इनका गौत्र - वसिष्ठ तथा प्रवर- वसिष्ठ, अत्रि और सांकृति है । वेद-यजुर्वेद, शाखा - वाजसनेयी, सूत्र - पारस्कर, गृह्यसूत्र, कुलदेवी - कालिकाजी और इष्टदेव - लक्ष्मण हैं। 

इस वंश का निकास सूर्यवंशी रामचन्द्र के पुत्र लव से है। ये ढूंढाड़ प्रदेश के शासक थे । राजस्थान के 'राजौर'  तथा 'दौसा'  इनकी राजधानियाँ रहीं ।

देवीसिंह जी बड़गूजरों को मेवाड़ के गुहिल वंश से भी जोड़ते हैं वे लिखते हैं कि राजा गुहिल के वंशजों में एक सन 593 ई के लगभग राजौरगढ़ को अपनी राजधानी बनाकर रहने लगा। उसके पूर्वज गुजरात से आये थे, इसलिए उसके वंशज बड़गूजर कहलाये तथा राजौर में बसने के कारण राजौरा कहलाये और रघुवंशी होने के कारण अपने नाम के आगे राघव लिखने लगे। 

राजौर के बड़गूजरों की शाखाएँ देवती, मांचेडी, दौसा, तीतरवाड़ा, कोलासर, शंकरगढ़, भानगढ़ और सीकरी तक फैली हुई थी । जहाँ इनके छोटे-छोटे राज्य कायम हो गए थे। इस समय उत्तर भारत पर सम्राट हर्षवर्धन का राज्य था, जिसकी राजधानी कन्नौज थी ।

वर्तमान अलवर जिले के टहला के अन्तर्गत एक गोलाकार पहाड़ी, प्राकृतिक दुर्ग के समान है। यहाँ बड़गूजर शासकों के बनाए गए मन्दिर कदम-कदम पर हैं। इसी क्षेत्र में कन्नौज के प्रतिहार साम्राज्य के समय के दो शिलालेख मिले हैं। जिनसे ज्ञात होता है कि उस समय राजौर पर महाराजाधिराज सावट के पुत्र महाराजाधिराज परमेश्वर मंथनदेव बड़गूजर राज्य करते थे । वे  कन्नौज के प्रतिहार सम्राट के सामंत थे । 

दौसा का आधा क्षेत्र तो बड़गूजरों के अधिकार में था और शेष इलाका मोरां के चौहान शासकों के अधिकार में था। नरवर के राजा सोढ़देव कछवाहा के पुत्र दुलहराय का विवाह मोरां के चौहान शासक रालणसिंह की पुत्री से हुआ था। चौहानों और बड़गूजरों में अनबन थी। वे एक-दूसरे के गाँव दबाने में लगे हुए थे। 

अतः रालणसिंह ने अपनी सहायता हेतु दुलहराय को नरवर से बुलाया और चौहानों एवं कछवाहों ने मिलकर बड़गूजरों से दौसा छीन लिया। इस प्रकार दौसा पर दुलहराय कछवाहा का अधिकार हो गया । दौसा वाले अपने भाई-बन्धुओं की सहायता के लिए देवती के बड़गूजरों की सेना आई, किन्तु उसे भी चौहानों और कछवाहों की सम्मिलित शक्ति के आगे हार कर वापस जाना पड़ा।

राजौरगढ़ का रामराय बड़गूजर सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता अजमेर के शासक सोमेश्वर के सामंत थे । जब सोमेश्वर ने मेवात के शासक मुदगलराय पर चढ़ाई की तो उस युद्ध में मुदगलराय के सामंत कुरंभ को रामराय ने द्वन्द्व युद्ध में मारा। 

मांचेड़ी  की बावड़ी पर सं 1382 ई के शिलालेख के अनुसार दिल्ली के सुलतान फिरोजखान तुगलक के समय मांचेड़ी पर महाराजधिराज गोगदेव बड़गूजर का शासन था। आमेर के राजा भारमल के समय देवती के राजा ईसरदास बड़गूजर ने चूहड़ खान बिलोच की सहायता से आमेर पर आक्रमण किया था, किन्तु हार कर वापस हटना पड़ा। बाद में शेरशाह सूरी के मंत्री रहे देवती निवासी  हेमू के परिवार का पीछा करने हेतु अकबर ने सेना भेजी तब देवती के शासक ईसरदास जी बड़गूजर ने जौहर और शाका किया और बड़ी वीरता से मुग़ल सेना से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। इस कारण ईसरदासजी की बड़ी ख्याति हुई।  मुग़ल सेना ने देवती को नष्ट कर दिया तब बड़गूजरों ने मांचेड़ी को अपनी राजधानी के रूप में विकसित किया। 

आमेर के राजा मानसिंह ने ई सं 1597 में बड़गूजरों पर चढ़ाई की, बसवा के निकट युद्ध हुआ, जिसमें कच्छावों की जीत हुई और बड़गूजरों से भानगढ़ छीन लिया गया। सवाई जयसिंह जी के समय तक देवती, मांचेड़ी, राजौर आदि जगह पर बड़गूजर राज्य कायम था।  मांचेड़ी पर उस वक्त राजा अद्योत सिंह बड़गूजर राज कर रहे थे, वे औरंगजेब के मनसबदार भी थे, पर उनके छोटे भाई जोरावर सिंह द्वारा भाभी के ताना मारने पर आमेर में सवाई जयसिंह जी पर भाला फैंक उन्हें मारने की कोशिश की, तब जयसिंह जी को बड़गूजर राज्य पर हमला करने का मौका मिल गया और उन्होंने आक्रमण कर देवती, मांचेड़ी, राजौर क्षेत्रों को स्थायी रूप से कछवाह राज्य में शामिल कर लिया। 

राजौर के बड़गूजरों की एक शाखा ने आगरा के पास सीकरी में अपना राज्य कायम किया जिससे वे सिकरवार कहलाये। सीकरी में इनका राज्य बहुत बहुत लम्बे समय तक रहा। राजस्थान के धौलपुर, जयपुर, अलवर, और दौसा जिलों के तथा हरियाणा के गुरुग्राम जिले के अतिरिक्त आगरा, हरदोई, गोरखपुर, गाजीपुर, मोरेना, आजमगढ़, पलामू, गया ,  आरा ,  शाहबाद ,  सासाराम ,  सहरसा आदि जिलों में एवं क्षेत्रों में बड़गुजरों की शाखाएं फैली है।  

इस तरह बड़गूजर राजवंश का इतिहास बहुत ही गौरवशाली रहा है, अगले लेख में फिर इसी तरह की जानकारी लेकर उपस्थित होंगे तब तक बने रहे हमारे साथ।  धन्यावद जय हिन्द जय भारत जय राजपुताना 



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